बिहार SIR पर लगातार कोलाहल के बीच आज फाइनल वोटर लिस्ट जारी होगी। यह अभूतपूर्व है, जब देश में पहली बार किसी राज्य में SIR जैसी प्रक्रिया लागू की गई है। हालांकि चुनाव आयोग सफाई देता है कि 2002-03 में भी ऐसा ही रिवीजन हुआ था, लेकिन यह दावा ग़लत है, कानून में केवल “Intensive Revision” का ज़िक्र है, जबकि “Special Intensive Revision” नाम से कोई वोटर रिवीजन कभी नहीं हुआ।
चुनाव आयोग ने SIR के ज़रिए पुरानी वोटर लिस्ट को एक तरह से खारिज कर दिया। आयोग अब “Afresh” (नए सिरे से) से इतने कम समय में वोटर लिस्ट बना रहा है।
RTI कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने एक RTI दायर करके पूछा था- पूरे देश में SIR कराने का फैसला कैसे हुआ? किसकी सिफारिश पर हुआ? कौन सी फाइल बनी?
चुनाव आयोग का जवाब चौंकाने वाला था: कोई फाइल ही मौजूद नहीं
चुनाव आयोग ने हलफनामे में कहा था कि यह सब ‘स्वतंत्र मूल्यांकन’ के आधार पर हुआ। लेकिन जब RTI में उसका रिकॉर्ड मांगा गया तो उसका भी कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं निकला।
वहीं जब चुनाव आयोग से बिहार में 2003 के Intensive Revision के आदेश की कॉपी मांगी गई तो आयोग ने 2025 का SIR आदेश थमा दिया।
खैर हम बिहार SIR पर वापस आते हैं; आखिर यह अभूतपूर्व क्यों है ?
भारत जोड़ो अभियान (civil society group) के राष्ट्रीय संयोजक योगेंद्र यादव, जो स्वयं इस मामले में याचिकाकर्ता हैं, उन्होंने इस पक्ष में सबसे शानदार तथ्य सुप्रीम कोर्ट में पेश किए थे:
यादव, इस प्रक्रिया को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की संरचना (architecture of universal adult franchise) में एक भूकंपीय बदलाव (tectonic shift) मानते हैं। उनका मानना है कि वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां हैं, जिन्हें दूर करना चुनाव आयोग का कर्तव्य है और यह तभी हो सकता है जब हर वोटर के घर-घर जाकर पूरी पारदर्शिता के साथ फिजिकल वेरिफिकेशन हो; दुर्भाग्य से SIR ऐसा नहीं करता और यही बात कोई समझ नहीं पा रहा।
बहुत कम लोगों ने इस पर ध्यान दिया है कि SIR ने घर-घर जाकर सत्यापन के नाम पर वास्तव में कुछ बिल्कुल नया और अभूतपूर्व (unprecedented) कर दिया है।
2003 में SIR जैसा कुछ नहीं था, उस समय इसे IR कहा जाता था। उस समय सभी लोगों से फॉर्म भरवाने या दस्तावेज़ माँगने की कोई शर्त नहीं थी। देश के इतिहास में कभी भी मतदाता सूची के संशोधन में ऐसा नहीं हुआ कि हर किसी से फार्म भरवाया जाए और दस्तावेज़ लिए जाएं।
2003 में तो बस मतदाता सूची का कंप्यूटरीकरण हो रहा था। चुनाव अधिकारियों को सूची का प्रिंटआउट दिया जाता था, जिसमें दो पंक्तियों की जानकारी होती थी। उन्हें घर-घर जाकर यह जांचना होता था। न कोई फॉर्म भरवाया जाता था, न दस्तावेज मांगे जाते थे।
अब यह house-to-house enumeration इस देश के इतिहास में अब तक जो भी हुआ है उससे बहुत अलग है क्योंकि अब दो नई बातें पहली बार लागू की जा रही हैं — जैसे किसी दवा में दो जहरीली मिलावटें।
पहली मिलावट यह है: पहली बार मतदाता को कहा जा रहा है — यह रहा आपका फॉर्म, इसे भरिए।अगर आपने सही से नहीं भरा तो आप स्वतः ही वोटर लिस्ट से बाहर हो जाएंगे।
जो व्यक्ति 20–40 साल से वोट दे रहा है अब उसे शक की निगाह से देखा जा रहा है।
पहली बार नागरिकता के ऐसे प्रमाण मांगे जा रहे हैं, जो ज्यादातर लोगों के पास है ही नहीं।
यह ठीक वैसा ही है जैसा 19वीं सदी के अमेरिका में हुआ था—जहाँ अश्वेत गुलामों को मुक्त तो किया गया, लेकिन वोट से वंचित रखने के लिए ऐसे दस्तावेज मांगे गए, जो उनके पास नहीं थे।
अब यह इतना अहम क्यों है? इसलिए क्योंकि वोटर लिस्ट में नाम बने रहने की ज़िम्मेदारी पहली बार मतदाता पर डाली जा रही है। और यह इतना बड़ा फैसला क्यों है? क्योंकि पूरी दुनिया में दो तरह की प्रणालियाँ हैं:
एक है, राज्य द्वारा शुरू की गई रजिस्ट्रेशन प्रणाली (state-initiated registration), जिससे लगभग पूरी आबादी (95–99%) वोटर लिस्ट में दर्ज हो जाती है। भारत में यह आंकड़ा 99% (Elector to population Ratio) तक पहुँच चुका था, इसे EP Ratio भी कहा जाता है।
दूसरी है, व्यक्ति–प्रेरित रजिस्ट्रेशन प्रणाली (individual-initiated registration), जैसे अमेरिका में। वहाँ वोटर रजिस्ट्रेशन 70–75% पर ही रुक जाता है, पिछले लोकसभा चुनाव में यह सिर्फ़ 74% था।
यानी अगर अमेरिका में 100 लोग व्यवस्क (adult) हैं तो उनमें से केवल 74 लोगों के पास ही मताधिकार है, जबकि भारत में SIR होने से पहले अभी तक 99 % लोगों के पास मताधिकार है।
इतिहास गवाह है — जहाँ भी जिम्मेदारी राज्य से हटाकर नागरिक पर डाली जाती है, वहाँ कम से कम एक चौथाई लोग सूची से बाहर हो जाते हैं — और इनमें ज्यादातर हाशिये पर रहने वाले होते हैं। इसी वजह से EP Ratio(eligible voters का प्रतिशत) गिरा है।
तो यह पहला बड़ा और अभूतपूर्व बदलाव है — अवैध भी।
दूसरी मिलावट यह है: पहली बार हर किसी से कहा जा रहा है — “मुझे नहीं पता कि आप भारतीय नागरिक हैं या नहीं। जब तक आप प्रमाणपत्र (certificates) नहीं दिखाते, मैं आपको वोटर नहीं मानूँगा।”
यह चुनाव आयोग ने पहले कभी नहीं किया। 1980 के दशक में एक बार कोशिश की थी। सुप्रीम कोर्ट ने उस पर सख्ती से रोक लगाई थी। वही मशहूर लालन बाबुआन हुसैन केस था। तब से लेकर अब तक चुनाव आयोग ने हमेशा कहा: “नागरिकता तय करना हमारा काम नहीं है“
इस पर चुनाव आयोग ने विस्तृत दिशा-निर्देश भी जारी किए थे कि इस काम से दूर रहना है, लेकिन अब पहली बार बिना किसी क़ानून बदले, बिना किसी नियम बदले, बिना सुप्रीम कोर्ट के अपना मत बदले, चुनाव आयोग ने एकतरफा अपना रुख़ बदल लिया है और कह दिया है कि हर किसी को दस्तावेज़ पेश करने होंगे।
यही वो चीज़ें हैं जो Special Intensive Revision (SIR) को इतना ‘स्पेशल’ ही नहीं बल्कि खतरनाक और असंवैधानिक बना देती हैं। और यही कारण है कि SIR कोई समस्या का समाधान नहीं है। बल्कि खुद समस्या है।
अब तक 65 लाख से ज़्यादा लोगों के नाम लिस्ट से हटाए जा चुके हैं। बिहार में SIR होने से पहले EP Ratio 97% था, मतलब अगर बिहार में वयस्क (18+) के लोगों के संख्या 100 थी तो उनमें से 97 लोगों के पास वोट करने का अधिकार था, लेकिन SIR के ड्राफ्ट रोल के बाद ही 65 लाख लोगों को जैसे ही वोटर लिस्ट से बाहर किया यह Ratio गिरकर 88 % पर आ गया।
बिहार में वयस्क आबादी 8.18 करोड़ है — ये आंकड़ा भारत सरकार का है, इसमें मौत या लोगों के बाहर जाने जैसी कोई गड़बड़ी नहीं है, क्योंकि ये जनगणना पर आधारित है।
अब, बिहार की वोटर लिस्ट में 7.89 करोड़ लोग दर्ज थे (24 जून 2025 तक)। यानी शुरू से ही 29 लाख लोग कम थे। अब वोटर ड्राफ्ट में 7.24 करोड़ मतदाता बचे हैं, यानी 94 लाख नाम वोटर लिस्ट से ड्राफ्ट पब्लिश होने से पहले काट जा चुके हैं।
यदि वे इस विचार के साथ प्रयोग करना चाहते थे तो उन्हें ऐसे राज्य से शुरू करना चाहिए था जहां दो या तीन साल बाद चुनाव होने थे और देश को यह दिखाना चाहिए था कि यह सही काम है। यहां मुझे लगता है कि उन्होंने भानुमती का पिटारा खोल दिया है।
(प्रत्यक्ष मिश्रा पब्लिक पॉलिसी रिसर्चर हैं।)
इनसे यहाँ [email protected] संपर्क किया जा सकता है।